विशेष रिपोर्ट
अनुराग सिंह बिष्ट
उत्तर प्रदेश/ वाराणसी/ रामनगर
*रामनगर_रामलीला_के_चौबीसवें और पच्चीसवें दिन का प्रसंग(राम रावण युद्ध, रणभूमि अवलोकन , त्रिजटा सीता जी संवाद) दिन का प्रसंग*
बहुरी राम सब तन चितई बोले बचन गंभीर।
द्वंद्व युद्ध देख हूं सकल श्रमित भए अति बीर।।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।
आज के लीला में जब सभी रावण के महाभट योद्धा मारे जाते हैं तो रावण स्वयं ही युद्ध करने आता हैं वो इतना भयंकर युद्ध करता है कि देवता और सभी बंदर सेना भयभीत हो जाती है ।विभीषण जी रावण को रथ पर देखकर और राम जी को पैदल युद्ध करते देखकर बहुत दुखी होते है परन्तु राम जी उनको ज्ञान देते है कि जिस रथ से युद्ध किया जाता है वो शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में रखना,)और परोपकार ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं, जिसके पास ऐसा रथ हो उसको किसी पर भी विजय प्राप्त करना कठिन नहीं हैं युद्ध इतना भीषण होता है की उसका वर्णन तुलसी दास जी अद्भुत करते है वो लिखते है,,, युद्ध देखने के लिए नभ में सारे देवता आदि आ जाते है भगवान शिव माता पार्वती से कहते है मैं भी वहां था और राम जी का रण कौशल देख रहा था।
सुर ब्रह्मादी सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े विमाना
हमहुँ उमा रहे तेहि संगा।देखत राम चरित रन रंग
आगे युद्ध वृत्तांत को लिखते है,,,
धरि गाल फारही उर बिदारही गल अंतावरी मेलही
प्रह्लादपति जनु विविध तनु धरि समर आंगन खेलही।
बंदर राक्षसो के गाल फाड़कर उनका पेट फाड़कर अंतड़िया बाहर निकाल कर अपने गले में टांग लेते है। मानो ऐसा लगता है प्रहलाद के इष्ट देव अर्थात् नरसिंह भगवान का रूप बानर धरकर संग्राम में खेलते है।
आगे के प्रसंग के देखे तो,, ।फिर सभी महान योद्धा रावण से युद्ध करते है। कभी हनुमान जी तो कभी विभीषण ,सुग्रीव, जामवंत ,नल नील परन्तु सभी रावण से युद्ध करके उसके बल की प्रशंसा करके लौट जाते है। रावण भी इन लोगों के बल की प्रशंसा करता है तत्पश्चात लक्ष्मण जी से युद्ध होता है लक्ष्मण जी मूर्छित हो जाते है , तब रावण उनको उठाने के लिए आता है परंतु वह उठा नही पाता तब हनुमान जी लक्ष्मण जी को, राम जी के पास ले जाते है , राम जी के आशिर्वाद और विश्वास से लक्ष्मण जी उठ जाते है। लक्ष्मण जी उठते ही पुनः युद्ध करने के लिए चले जाते है। रावण और लक्ष्मण जी में भयावार युद्ध होता है। लक्ष्मण जी रावण को शक्ति मारते है।रावण मूर्छित हो जाता है और रावण का सारथी रावण को लंका लेकर चला जाता है ।यही कल जो कथा नहीं हुई थी उसका विश्राम होकर संध्या होता है।
संध्या बाद आज की लीला शुरू होती है,,,,
सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।
अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा॥
आज के लीला में रावण यज्ञ करता है। इसकी सूचना विभीषण जी राम जी को देते है तब राम जी अंगद हनुमान आदि को यज्ञ भंग करने के लिए भेजते है। वहां जाय सभी वानरी सेना यज्ञ भंग करती है। तत्पश्चात रावण पुनः युद्ध के लिए रणभूमि की तरफ चलता हैं ।तत्पचात इन्द्र, राम जी को दिव्य रथ भेजते है तब राम जी उस पर विराज मान होकर द्वंद्व युद्ध रावण से करते है।जिसे देखने देवता गण भी आकाश में आते है।आज रण भूमि में सैन्य प्रदर्शन होता हैं जो रामनगर रामलीला की अद्भुत अद्वितीय प्रसंगो में एक हैं ,इस प्रसंग में जितने पात्र सैन्य प्रदर्शन करते हैं वो सभी मुस्लिम समुदाय से हैं ये कोई आश्चर्य की बात नही हैं ये राम की नगरी , वेदव्यास जी की दूसरी काशी रामनगर हैं यहां की जनता के लिए राम आदिपुरुष है,अब चाहे वो हिंदू हो या मुस्लिम या कोई भी समुदाय से हों। ब्रह्मांड के सभी प्रबुद्ध जनों को यहां की लीला से यह सीख लेनी चाहिए। आगे की कथा को देखे तो,राम जी और रावण में बहुत घमासान युद्ध होता है कभी कभी ऐसा लगता है मानो रावण हार ही नहीं सकता बार बार राम जी उसका सिर काटते है परन्तु वो फिर से आ जाता है रावण मायावी भी था।युद्ध देखकर आकाश में देवता वृंद भी विचलित हो जाते है और डर से कंदरा में भागने की बात कहते है। जब सभी वानरी सेना हार मानने लगती है तब राम जी कहते है की अब हमारी और रावण की अकेली अकेला का युद्ध देखो, राम रावण जी के बीच का संवाद वीर रस से भरा होता है।इधर त्रिजटा सीता जी को अशोक वाटिका में युद्ध का सारा वृतांत सुनाते धीरज देते कहती है,हे सुंदरी! संदेह का त्याग कर दो; अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा ,”राम जी यही सोचकर रह जाते हैं की इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हृदय में मेरा निवास है और मेरे उदर में अनेकों भुवन हैं। अतः रावण के हृदय में बाण लगते ही सब भुवनों का नाश हो जाएगा।” यह वचन सुनकर सीता जी के मन में अत्यंत हर्ष और विषाद हुआ तब त्रिजटा ने कहा “जब ध्यान छूटेगा तब भगवान वाण मारेंगे।” यह सीता जी सुन के शांत होती है।यही कथा का विश्राम हो जाता है और आज की आरती रणभूमि में ही इंद्ररथ पर भगवन विराजमान होते है और आज की आरती भी विभीषण जी ही करते हैं।
प्रधान संपादक विशेष रिपोर्ट




