विशेष रिपोर्ट
अनुराग सिंह बिष्ट
राजधानी/ लखनऊ
माँ के दूध तक पहुँचा ज़हर, स्वास्थ्य सुरक्षा पर सवाल,
*माँ का दूध भी प्रदूषण से अछूता नहीं, अध्ययन ने बढ़ाई चिंता,
माँ का आँचल बच्चे के लिए सुरक्षा और ममता का प्रतीक है, वहीं माँ का दूध नवजात के लिए प्रकृति का सबसे महत्वपूर्ण आहार माना जाता है। जन्म के बाद स्तनपान बच्चे के पोषण और विकास में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन बदलते पर्यावरण, खाद्य पदार्थों में रसायनों की मौजूदगी और प्रदूषण को लेकर सामने आ रहे वैज्ञानिक अध्ययन इस व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर रहे हैं।
लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय और विष विज्ञान संस्थान से जुड़े वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में स्तनपान कराने वाली 100 महिलाओं के दूध के नमूनों की जांच की गई। अध्ययन के अनुसार 96 प्रतिशत नमूनों में ओक्राटॉक्सिन और 73 प्रतिशत नमूनों में अफ्लाटॉक्सिन एम-1 की मौजूदगी पाई गई। इसके अलावा जियरालेनोन जैसे अन्य मायकोटॉक्सिन की मौजूदगी का भी उल्लेख किया गया है।
अध्ययन में कुछ नमूनों में मैंगनीज, आर्सेनिक, कैडमियम, क्रोमियम और सीसा जैसी धातुओं की मौजूदगी भी सामने आई। विशेषज्ञों के अनुसार कृषि में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक इस्तेमाल, दूषित पानी तथा पर्यावरणीय प्रदूषण ऐसे तत्वों के मानव शरीर तक पहुँचने के संभावित कारणों में शामिल हो सकते हैं।
इन निष्कर्षों को व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है। किसी एक अध्ययन के आधार पर पूरे समाज या देश की स्थिति का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा और इस विषय में बड़े स्तर पर आगे के अनुसंधान की आवश्यकता है। फिर भी ऐसे अध्ययन हमें खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग होने का संकेत जरूर देते हैं।
आज आवश्यकता है कि कृषि में रसायनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की नियमित जांच, स्वच्छ जल और पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाए। आखिर माँ के दूध की शुद्धता केवल एक परिवार का विषय नहीं, बल्कि स्वस्थ पीढ़ी के निर्माण से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है।
माँ का आँचल सुरक्षित रहे और उसकी गोद में पलने वाला हर बच्चा स्वस्थ भविष्य पाए-यही आधुनिक विकास की वास्तविक कसौटी होनी चाहिए।




